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नगर निगम कमिश्नर अविनाश मिश्रा वार्ड के अंदर की बदहाल सफाई व्यवस्था से अनभिज्ञ है |

नगर निगम कमिश्नर अविनाश मिश्रा वार्ड के अंदर की बदहाल सफाई व्यवस्था से अनभिज्ञ है |

महापौर एजाज ढेबर द्वारा विगत दिनों दिया गया बयान कि पीएम को भी महापौर की इस सीट पर बैठा दिया जाए तो भी समस्याएं समाप्त नहीं हो सकती | वहीं दूसरी तरफ नगर निगम रायपुर के कमिश्नर अविनाश मिश्रा द्वारा कैनाल रोड के फ्लाई ओवर की साफ सफाई के लिए तो अधिकारियों को सख्त निर्देश दे दिए गए परंतु निगम कमिश्नर की नजर मुख्य मार्गो तक ही सीमित रहती है, क्योंकि उन्हें अधिकारी के तौर पर मुख्य मार्गों पर ही आवागमन करना है इसलिए उन्हें मुख्य मार्ग पर साफ सुथरी सड़कों पर थोड़ा सा भी कचरा दिख जाए तो वह उन्हें नजर आ जाता है परंतु वे वार्ड के अंदर की गंदगी की स्थिति को नहीं जानते है , ऐसा लगता है की नगर निगम कमिश्नर अविनाश मिश्रा वार्ड के अंदर की बदहाल सफाई व्यवस्था से अनभिज्ञ है, क्योंकि अगर उन्हें पता होता कि राजधानी के सभी 70 वार्डों के अंदरूनी इलाकों में गंदगी का जो आलम है, नालिया नाले बज बजा रहे हैं, नालों में पांच - पांच फीट तक कचरा भरा हुआ है और नालियां एक से डेढ़ फीट तक जो उनकी गहराई है वह गंदगी से भरी पड़ी है, जोन 10 के अंतर्गत वार्ड क्रमांक 52 के इन दो मंदिरों के आसपास की इन तस्वीरों को देखकर आप सहज ही अंदाजा लगा सकते हैं की सफाई के मामले में नगर निगम की क्या स्थिति है, यह ट्रेलर नहीं एक झलक मात्र है, यदि ट्रेलर और पिक्चर को देखेंगे तो रायपुर के आम नागरिकों को पीड़ा होगी क्योंकि उनके खून पसीने की कमाई से दिए जा रहे टैक्स की रकम से सफाई के नाम पर अधिकारियों, जनप्रतिनिधियों और ठेकेदारों के बीच खुले आम बंदर बांट चल रही है | रायपुर के जोन क्रमांक 10 के वार्ड क्रमांक 52 में महावीर नगर के बसंत पार्क में मां दुर्गा और शंकर भगवान के मंदिरों के आजू-बाजू गंदगी के बीच आसपास के भक्त, श्रद्धालु, माताएं - बहने, युवा, बुजुर्ग दर्शन करने मजबूर हैं | नगर निगम का सफाई अमला चाहे पार्षद हो, ठेकेदार हो, अधिकारी हों बिना सफाई कार्य किये हर महीने नियमित रूप से राशि का लेनदेन कर रहे हैं | मजे की बात यह है की शिकायत होने पर साल में एक बार या दो बार ठेकेदार पर नाम मात्र के लिए 5 हजार रूपए का जुर्माना लगाकर कार्यवाही को इतिश्री कर दिया जाता है जबकि होना यह चाहिए कि एक बार या दो बार के बाद ठेकेदार की गलती मिलने पर उसे पर जुर्म दर्ज कर जेल भेज देना चाहिए परंतु ऐसा होता नहीं है क्योंकि सब मिली भगत और लेनदेन का नीचे से ऊपर तक का चक्कर है तो करवाई हो भी तो कैसे ? जबकि देखा जाए तो सफाई ठेकेदारों द्वारा तय कर्मचारियों में से आधे कर्मचारियों से ही आधा कार्य करवा कर हर मां एक से डेढ़ लाख रुपए की अवैध बचत की जाती है इस प्रकार साल भर में ठेकेदारों द्वारा एक वार्ड में 70 से 80 लख रुपए के सफाई घोटाले में से पांच या ₹10000 जुर्माना देकर एक बड़ी रकम अवैध रूप से अंदर कर ली जाती है | जुर्माना उनके लिए सही कार्य करने का सर्टिफिकेट बन जाता है और इस आधार पर सफाई ठेकेदार कानूनी कार्यवाही से बच जाते हैं क्योंकि उन्होंने तो अपनी गलती के लिए 5 हजार या 10 हजार रूपए जुर्माना भर दिया है | परंतु वहीं दूसरी तरफ टैक्स देने वाले नागरिक नियमित रूप से हर माह का टैक्स देने के बावजूद नगर निगम की सुविधा प्राप्त करने से वंचित रह जाते हैं और उनकी कोई सुनवाई नहीं होती | अब सवाल या उठना है कि नगर निगम कमिश्नर, महापौर और जनप्रतिनिधि जैसे कि सांसद विधायक और पार्षद सफाई ठेकेदारों पर मेहरबान क्यों रहते हैं यह विचारणीय विषय है जो इस बात की ओर इशारा करता है कि कुछ तो है जो ठेकेदारों के खिलाफ कुछ बोलने के लिए उनके मुंह को बंद रखता है |

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