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अमेरिकी महिला सुजन ने देखा लोहड़ी समारोह : छत्तीसगढ़ सिक्ख ऑफिसर्स वेलफेयर एसोसिएशन का आयोजन
छत्तीसगढ़ सिक्ख ऑफिसर्स वेलफेयर एसोसियेशन का आयोजन
अरदास के बाद ट्प्पे-बोलियों के साथ मनाई लोहड़ी
अमरीका से आई महिला “सुजन” ने देखी लोहड़ी मनाने की परंपरा
रायपुर, 21 जनवरी 2024/ छत्तीसगढ़ सिक्ख ऑफिसर्स वेलफेयर एसोसियेशन ने 20 जनवरी को आहूजा फार्म हाऊस, मुजगहन में परिवारजनों के साथ लोहड़ी का त्योहार मनाया। इस अवसर पर बी.एस. सलूजा ने सभी के सुख और खुशहाली के लिए वाहेगुरु जी से अरदास की। एसोसियेशन के संयोजक जी.एस. बॉम्बरा व अन्य सभी सदस्यों ने लोहड़ी की अग्नि प्रज्वलित कर तिल के लडढू, रेवड़ियां, गुड़, चिवड़ा और पॉपर्कान अग्नि को अर्पित कर परिवार और परिजनों के सुखों की कामना की। इस अवसर पर ओरेगान,अमरीका से रोटरी इंटरनेशनल के एक्सचेंज कार्यक्रम में मनजीत सिंह हूरा के घर आई महिला सुजॉन ने सिक्ख समाज के लोहड़ी समारोह को देखा समझा | लोहड़ी कार्यक्रम में पहली बार शामिल हुई अमेरिकी महिला सुजान पंजाबी महिलाओं के साथ भांगड़ा गिद्दा कर खूब आनंदित हुई |
कार्यक्रम में पंजाब के लोकगीतों बोलियां,टप्पे,गिद्दा और भांगड़ा नृत्य पर छत्तीसगढ़ सिख ऑफीसर्स वेलफेयर एसोसिएशन की महिलाएं एवं पुरुष जमकर थिरके ।
सरदार जगपाल सिंह, जी.एस. बॉम्बरा, दीप सिंह जब्बल, दलजीत सिंह डडियाला, मजीत सिंह हूरा,अमृता कौर ने एक ओर जहां पंजाबी गीतों की महफिल सजाई, वहीं पिंकी जब्बल,नीलजोत कौर डडियाला,हरमिन्दर कौर सलूजा,रछपाल कौर सलूजा ने पंजाबी बोलियां और ट्प्पों से समां बांध दिया।
पंजाबियों के लिए लोहड़ी उत्सव खास महत्व रखता है। जिस घर में नई शादी हुई हो वहां नई बहू और परिवार में नए जन्में बच्चों के सुख की कामना के साथ ही परिवारजनों और पड़ोसियों को विशेष तौर पर लोहड़ी पर बुलाया जाता है जिसमें तिल के लडढू और रेवड़ियां, गुड़, चिवड़ा और पॉपर्कान बांटे जाते हैं।
लोहड़ी त्योहार बहन और बेटियों की रक्षा और सम्मान के लिए भी मनाया जाता है।
लोहड़ी के पीछे एक ऐतिहासिक कथा हैं जिसे दुल्ला भट्टी के नाम से जाना जाता हैं। अकबर के शासनकाल में दुल्ला भट्टी पंजाब प्रान्त का सरदार था जिसे पंजाब का नायक कहा जाता था। उन दिनों पाकिस्तान में लड़कियों की खरीदफरोख्त की जाती थी । जिसका दुल्ला भट्टी ने विरोध किया और लड़कियों का सम्मानपूर्वक विवाह करवाकर कर नया जीवन दिया। दुल्ला भट्टी की इस विजय को लोहड़ी के गीतों में गाया जाता हैं और दुल्ला भट्टी को याद किया जाता हैं।
